अकेलापन का अहसास
— एक कविता
भीड़ में भी अक्सर खुद को तनहा पाया,
हर मुस्कान के पीछे एक दर्द छुपाया।
शब्द थे बहुत, पर सुनने वाला कोई न था,
मन की गहराइयों में बस सन्नाटा ही था।
रात की चुप्पियों में दिल ने कुछ कहा,
चाँद भी खामोश था, बस तन्हा सा लगा।
साये भी छोड़ गए साथ चलना,
जब ज़रूरत थी सबसे ज़्यादा समझना।
हर रिश्ता जैसे एक परछाईं बना,
जो पास तो है, पर फिर भी कहीं गुमशुदा।
खुद से बातें कर के ही अब जी लेता हूँ,
ख्वाबों में खुद को फिर से ढूँढ़ लेता हूँ।
अकेलापन एक दर्द नहीं, आदत बन गई है,
अब तन्हाई भी जैसे अपनी सहेली बन गई है।
पर फिर भी उम्मीद का एक कोना जिंदा है,
कि शायद कहीं कोई मेरी सिसकी को भी सुनता है।
अकेलापन — शायरी में
भीड़ में भी तन्हा रहने का फ़साना हूँ,
खुश दिखकर भी अंदर से वीराना हूँ।
हर आवाज़ से अब दिल डरने लगा है,
सन्नाटों में ही खुद को मैं पाना हूँ।
रिश्ते तो हैं पर मतलब के सभी निकले,
मैं तो बस एक वक़्त का बहाना हूँ।
रातें पूछती हैं, क्यों जागता हूँ मैं,
क्या कहूँ... नींद से भी अब बेगाना हूँ।
आईना भी अब मुझसे नज़रें चुराता है,
लगता है खुद का ही पराया ठिकाना हूँ।
पर फिर भी दिल में एक चिंगारी सी जलती है,
कि शायद किसी का इंतज़ार अधूरा अफ़साना हूँ।
अकेलापन — उम्मीद की शायरी
तन्हा हूँ मगर टूट कर बिखरा नहीं हूँ,
अंधेरों में भी एक दीप सा जला हुआ हूँ।
हर दर्द ने मुझे थोड़ा और सिखा दिया,
अब ज़ख़्मों में भी मैं मुस्कुरा रहा हूँ।
जो छूट गए, वो शायद मंज़िल न थे,
अब नई राहों का सपना बुन रहा हूँ।
ख़ामोशियाँ भी अब साथ चलने लगी हैं,
इन सन्नाटों में उम्मीदें पल रही हैं।
कल सूरज निकलेगा, ये यक़ीन रखता हूँ,
हर रात के बाद नया सवेरा आता हूँ।
हाँ, अकेलापन है, मगर हार नहीं मानी,
मैं खुद ही अब अपने लिए कहानी बन रहा हूँ।
— एक कविता
भीड़ में भी अक्सर खुद को तनहा पाया,
हर मुस्कान के पीछे एक दर्द छुपाया।
शब्द थे बहुत, पर सुनने वाला कोई न था,
मन की गहराइयों में बस सन्नाटा ही था।
रात की चुप्पियों में दिल ने कुछ कहा,
चाँद भी खामोश था, बस तन्हा सा लगा।
साये भी छोड़ गए साथ चलना,
जब ज़रूरत थी सबसे ज़्यादा समझना।
हर रिश्ता जैसे एक परछाईं बना,
जो पास तो है, पर फिर भी कहीं गुमशुदा।
खुद से बातें कर के ही अब जी लेता हूँ,
ख्वाबों में खुद को फिर से ढूँढ़ लेता हूँ।
अकेलापन एक दर्द नहीं, आदत बन गई है,
अब तन्हाई भी जैसे अपनी सहेली बन गई है।
पर फिर भी उम्मीद का एक कोना जिंदा है,
कि शायद कहीं कोई मेरी सिसकी को भी सुनता है।
अकेलापन — शायरी में
भीड़ में भी तन्हा रहने का फ़साना हूँ,
खुश दिखकर भी अंदर से वीराना हूँ।
हर आवाज़ से अब दिल डरने लगा है,
सन्नाटों में ही खुद को मैं पाना हूँ।
रिश्ते तो हैं पर मतलब के सभी निकले,
मैं तो बस एक वक़्त का बहाना हूँ।
रातें पूछती हैं, क्यों जागता हूँ मैं,
क्या कहूँ... नींद से भी अब बेगाना हूँ।
आईना भी अब मुझसे नज़रें चुराता है,
लगता है खुद का ही पराया ठिकाना हूँ।
पर फिर भी दिल में एक चिंगारी सी जलती है,
कि शायद किसी का इंतज़ार अधूरा अफ़साना हूँ।
अकेलापन — उम्मीद की शायरी
तन्हा हूँ मगर टूट कर बिखरा नहीं हूँ,
अंधेरों में भी एक दीप सा जला हुआ हूँ।
हर दर्द ने मुझे थोड़ा और सिखा दिया,
अब ज़ख़्मों में भी मैं मुस्कुरा रहा हूँ।
जो छूट गए, वो शायद मंज़िल न थे,
अब नई राहों का सपना बुन रहा हूँ।
ख़ामोशियाँ भी अब साथ चलने लगी हैं,
इन सन्नाटों में उम्मीदें पल रही हैं।
कल सूरज निकलेगा, ये यक़ीन रखता हूँ,
हर रात के बाद नया सवेरा आता हूँ।
हाँ, अकेलापन है, मगर हार नहीं मानी,
मैं खुद ही अब अपने लिए कहानी बन रहा हूँ।
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